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नये दौर का नया इरादा – हिन्दी भाषा के इन्टरनेट के बारे में हिन्दी में लिखूँ

पिछले सप्ताह, मैंने हिन्दी भाषा के इन्टरनेट के बारे में हिन्दी में लिखना शुरू किया

ज़िंदगी के इस नये दौर में मैं एक नई शुरूआत करना चाहता हूँ – हिंदी में लिखने की। अपनी पहली किताबें मैंने हिंदी में ही पढ़ी थी। अपनी पहली कविताएँ मैंने हिंदी में ही लिखी थी। देश में ज़्यादातर लोग हिंदी मे ही पढ़ते और लिखते हैं। मैं उनको (और खुदको) दोबारा समझना चाहता हूँ।

पिछले कुछ दिनों में मैं कई बार हिन्दी और भारतीय भाषाओं के बारे में बातचीतों का हिस्सा बना हूँ। २० करोड़ लोग हिन्दी में इंटरनेट का उपयोग करते हैं। देश में ९० प्रतिशत लोग भारतीय भाषाओं में वीडियो देखते हैं। मैं कुछ शर्मिन्दा हूँ कि मैंने इसके बारे में कभी ज़्यादा सोचा नहीं है। इस नये दौर में मैं हिन्दी और भारतीय भाषाओं के इन्टरनेट को समझना चाहता हूँ।

क्या पता यह छोटी सी शुरुआत समय के साथ क्या रूप ले ले। सालों से ख्वाहिश है कि फ़ैज़ की शायरी उर्दू में पढ़ूँ। सालों से ख्वाहिश है कि दोबारा हर रोज़ लिखूँ। कभी-कभी आगे बढ़ने के लिए पहले पीछे जाना ज़रूरी होता है। शायद समय के साथ यह ख्वाहिशें भी पूरी हो जाएँ।

इन्टरनेट को हिन्दी में पढ़ने के इरादे से, मैंने अपने फ़ोन की भाषा को भी हिन्दी में बदल दिया

हम सभी की ज़िन्दगी में एक समय आता है जब हम सफ़ेद बालों वाले बुजुर्ग बन जातें हैं। और बुजुर्गों का तो हक़ होता है कि (गलत समझकर) कहें – “हमारे समय से (उन पुराने, अच्छे दिनों से) अभी तक शायद ज़्यादा कुछ बदला नहीं है। केवल और-ज़्यादा, और-बड़ा या और-तेज काम करने को बदलाव नहीं कह सकते हैं। जो कुछ बदला भी है, लगता है कि ज़्यादातर बुरे के लिए ही बदला है!”

मेरा मानना है कि अगर हम दुनिया में कुछ नया नहीं देख पा रहे हैं तो हमें अपने ऑखों के चश्मे को, कैमरे के लेन्स को, या सोचने के नज़रिए को ही बदलना पड़ेगा। दुनिया तो हर रोज़ छोटे और बड़े तरीकों से बदल रही है। इस बदलाव को देखने और समझने की क्षमता बढाना हमारी ज़िम्मेदारी है।

कल मैंने एक नई शुरूआत की थी – हर रोज़ हिन्दी में लिखने की। आज मैं एक और शुरूआत कर रहा हूँ – इन्टरनेट को हिन्दी में देखने की। मैंने जैसे ही अपने फ़ोन की भाषा को हिन्दी में बदल दिया, मुझे लगा कि मेरे लिए इन्टरनेट का अनुभव एक पल में ही पूरी तरह बदल गया।

अगर हम किसी चीज को रोज़ाना देखते हैं तो कभी-कभी हम उस चीज़ को देखने की योग्यता खो देते हैं। हिन्दी में – हर ऐप, हर ऐप का हर फ़ीचर, हर स्क्रीन का हरेक शब्द मुझे नया दिख रहा है। और जब भी मैं एक अंग्रेजी के शब्द को देवनागरी में पढ़ता या लिखता हूँ तो मैं सोचता हूँ कि इसके बदले हिन्दी में कोई एक शब्द होना चाहिए।

आप भी अपने फ़ोन की भाषा को सिर्फ़ एक दिन के लिये हिन्दी में बदल कर देखिए। शायद आपका अनुभव और नज़रिया भी बदल जाए।

पिछले एक हफ्ते में, कई लोगों ने मुझसे पूछा है कि मैंने हिंदी में लिखना शुरू क्यों किया है। मेरे पास इस सवाल के तीन अलग-अलग जवाब हैं।

पहला जवाब यह है कि मैं दस सालों तक हर रोज़ इंटरनेट के बारे में लिखथा था, और अब मुझे रोज़ाना लिखे हुए दस साल हो गए हैं। अगर मैं फिर से रोज़ाना लिखना शुरू करता हूँ, तो अच्छा होगा कि पुराने विषयों और विचारों के बजाय कुछ नया लिखूँ। मुझे लगा कि हिंदी इंटरनेट के बारे में हिंदी में लिखना दिलचस्प होगा। इसके लिए इंटरनेट को देखने के एक नए नज़रिए और इंटरनेट के बारे में लिखने के एक नए तरीक़े की ज़रूरत होगी। मुझे उम्मीद है कि यह दोनों पहलू मुझे रोज़ाना लिखने के लिए उत्साहित रखेंगे।

दूसरा जवाब यह है कि, पिछले दस सालों में, शायद भारतीय इंटरनेट में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव हिंदी और भारतीय भाषाओं के इंटरनेट का विकास ही है। अन्य महत्वपूर्ण परिवर्तन ज़रूर हुए हैं। एक समय मैं मैंने सोचा था कि सोशल नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म दुनिया में अच्छे के लिए बदलाव लाएँगे, मगर यह नहीं हुआ है। क्रिएटरों की सोशल मीडिया पर ऑडियंस बनाने और उनसे पैसे बनाने की क्षमता ने हजारों नए करियरों को जनम दिया है। कई भारतीय इंटरनेट स्टार्टअप बिलियन डॉलर यूनिकॉर्न बन गए हैं। सरकारों और व्यापारिक कंपनियों के परिवर्तन एजेंडे में सबसे ऊपर “डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन” है। अन्य भूमिकाओं में, शायद मैंने इन परिवर्तनों के बारे में लिखना चुना होता। इस भूमिका में, मुझे हिंदी इंटरनेट के बारे में लिखना सबसे उचित लगता है।

तीसरा जवाब यह है कि भारतीयता के सार की समझ, भारत के बारे में जो विशिष्ट है उसे महत्व देने का इरादा, और भारत में व्यापार करने की जटिलता के साथ काम करने की क्षमता एडफैक्टर्स पीआर की सफलता के मूल में है। पिछले तीन हफ्तों में मैंने कई बार मदन बहल को एक प्रेस रिलीज को कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद करने, स्थानीय और भाषा मीडिया की मैपिंग करने, और उनके साथ एक कामकाजी संबंध बनाने के लिए “डीप इंडिया” नेटवर्क बनाने की आवश्यकता के बारे में बात करते हुए सुना है। डिजिटल के साथ, यह प्रभाव और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। मुझे उम्मीद है कि हिंदी के इंटरनेट के बारे में हिंदी में लिखने के मेरे इस छोटे से इरादे से हमारे २०० डिजिटल टीम के सदस्यों में भी एक इरादा बनेगा कि वह बड़े शहरों के बाहर रहनेवाले ऑनलाइन पत्रकारों, क्रिएटरों, और इंटरनेट यूजर्स के बारे में अधिक सोचें। ये ज़्यादातर भारतीय भाषाओं में पढ़ते, लिखते और बात करते हैं, और उनके साथ बात करने के लिए हमें भी उनकी भाषाएँ ही बोलनी पड़ेंगी।

मैं कोशिश करूँगा कि हिन्दी भाषा के इंटरनेट के बारे में लिखूँ, खुद के बारे में नहीं। मैं कोशिश करूँगा कि जो और लोग हिन्दी भाषा के इंटरनेट का विकास कर रहे हैं, या इसके बारे में लिख रहे हैं, उन्हें खोजूँ, उन्हें इकट्ठा करूँ, उनसे सीखूँ, और उनके साथ औरों को सिखाऊँ। मैं कोशिश करूँगा कि मैं हर रोज़ लिंक्डइन पर ३००-५०० शब्द की एक छोटी टिप्पणी लिखूँ और हर हफ़्ते ब्लॉग पर ज़्यादा विस्तार में अपने विचारों को इकट्ठा करूँ।

पिछले दस सालों में मैंने कई बार यह ब्लॉग दोबारा शुरू करने की कोशिश की है, मगर अलग-अलग कारणों से नाकामयाब रहा हूँ। मुझे लग रहा है कि इस बार शुभ मुहूर्त है और यह कोशिश कामयाब हो जाएगी।

मेरी टूटी-फूटी हिंदी के साथ आपका धैर्य और इस नए प्रयास के लिए आपका प्रोत्साहन महत्वपूर्ण होगा। अगर आपको लगता है कि और लोग हिन्दी भाषा के इंटरनेट के बारे में पढ़ने में उत्सुक होंगे, तो ज़रूर उन्हें भी इस ब्लॉग के बारे मैं बताइए।

अब आपके लिए एक सवाल: हिंदी इंटरनेट के बारे में और कौन सोच रहा है और लिख रहा है? मैं उनसे मिलना चाहता हूँ और उनसे सीखना चाहता हूँ। मुझे अच्छा लगेगा अगर आप नीचे टिप्पणी में हमें मिला दें।

By गौरव मिश्रा

नये दौर का नया इरादा - हिन्दी भाषा के इन्टरनेट के बारे में हिन्दी में लिखूँ

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